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Snakebite Compensation Scam Bilaspur : सर्पदंश मुआवजा घोटाले में गिरफ्तार तीन लिपिक निलंबित

Snakebite Compensation Scam Bilaspur छत्तीसगढ़ के बिलासपुर में बहुचर्चित सर्पदंश मुआवजा घोटाला मामले में गिरफ्तार तहसील के तीन लिपिकों नरेंद्र कौशिक, गरीबराम बिंझवार और हरिशंकर राठौर को निलंबित कर दिया गया है। वहीं पुलिस कार्रवाई के विरोध में सोमवार को जिलेभर के राजस्व लिपिकों ने काम बंद कर दिया, जिससे सभी तहसीलों में कामकाज ठप रहा। हालांकि कलेक्टर के आश्वासन के बाद कर्मचारियों ने प्रस्तावित तीन दिवसीय हड़ताल वापस ले ली।

कलेक्टर के आश्वासन के बाद हड़ताल वापस Snakebite Compensation Scam Bilaspur

छत्तीसगढ़ प्रदेश राजस्व लिपिक संघ, राजस्व पटवारी संघ और अधिकारी-कर्मचारी फेडरेशन के प्रतिनिधियों ने कलेक्टर से मुलाकात कर मामले की निष्पक्ष विभागीय जांच के लिए समिति गठित करने की मांग की। कलेक्टर द्वारा निष्पक्ष जांच का भरोसा दिए जाने और समझाइश के बाद कर्मचारियों ने तीन दिवसीय हड़ताल वापस लेने का निर्णय लिया, लेकिन सोमवार को तहसीलों में पूरा कामकाज प्रभावित रहा।

संघ बोला- सिर्फ लिपिकों को निशाना बनाना गलत

राजस्व लिपिक संघ का कहना है कि राजस्व प्रकरणों में तहसीलदार पीठासीन अधिकारी होते हैं और उन्हें न्यायिक संरक्षण प्राप्त है। रीडर और वाचक भी उसी न्यायिक प्रक्रिया का हिस्सा हैं, जिनका कार्य केवल प्रकरणों को प्रस्तुत करना और नस्तीबद्ध करना होता है। दस्तावेजों का सत्यापन उनकी जिम्मेदारी नहीं है। इसके बावजूद केवल लिपिकों को हथकड़ी लगाकर कार्रवाई (Snakebite Compensation Scam Bilaspur) करना और दुर्व्यवहार करना अनुचित है।

ऐसे होता था सर्पदंश मुआवजा घोटाला

पुलिस जांच के अनुसार एक संगठित गिरोह आरटीआई के माध्यम से सामान्य मौतों की मर्ग फाइलें हासिल करता था। इसके बाद फर्जी पोस्टमार्टम रिपोर्ट, जाली सील और कूटरचित दस्तावेजों के जरिए मौत का कारण सर्पदंश दिखाकर चार लाख रुपये का मुआवजा स्वीकृत कराया जाता था। आरोप है कि मुआवजा मिलने के बाद वकील और गिरोह के सदस्य पीड़ित परिवारों को झांसा देकर करीब 1.70 से 1.75 लाख रुपये आपस में बांट लेते थे।

पटवारी संघ ने भी उठाई निष्पक्ष जांच की मांग Snakebite Compensation Scam Bilaspur

राजस्व पटवारी संघ ने भी कलेक्टर को ज्ञापन सौंपकर निष्पक्ष जांच (Snakebite Compensation Scam Bilaspur) की मांग की है। संघ का कहना है कि पटवारियों को मर्ग रिपोर्ट या पोस्टमार्टम रिपोर्ट की सत्यता जांचने का कोई वैधानिक अधिकार नहीं है। कई मामलों में उनके फर्जी हस्ताक्षर और जाली सील लगाकर दस्तावेज तैयार किए गए। इसलिए जांच केवल राजस्व अमले तक सीमित न रखकर पुलिस और अन्य संबंधित विभागों की भूमिका की भी निष्पक्ष जांच की जानी चाहिए।

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