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Industrial Pollution Accountability : विधानसभा में घिरे वित्त मंत्री ओपी चौधरी, जिंदल के खिलाफ रायगढ़ कलेक्टर की ‘कुंभकर्णी’ नींद टूटी

Raigarh News : छत्तीसगढ़ की राजनीति में इन दिनों रायगढ़ जिला केंद्र बना हुआ है, लेकिन विकास के लिए नहीं, बल्कि (Industrial Pollution Accountability) औद्योगिक प्रदूषण जवाबदेही के अभाव के कारण। तमनार स्थित मेसर्स जिंदल पॉवर लिमिटेड के थर्मल पावर प्लांट से निकलने वाली राखड़ (फ्लाई ऐश) ने आसपास के गांवों का जीना मुहाल कर दिया है। आश्चर्य की बात यह है कि जिस समस्या से ग्रामीण महीनों से जूझ रहे थे, उस पर जिला प्रशासन तभी जागा जब विधानसभा में प्रदेश के वित्त मंत्री ओपी चौधरी की जमकर किरकिरी हुई।

विधानसभा में फंसी सरकार, बैकफुट पर वित्त मंत्री

छत्तीसगढ़ विधानसभा के बजट सत्र के दौरान कांग्रेस विधायक उमेश पटेल ने रायगढ़ जिले में फ्लाई ऐश के अवैध डंपिंग और औद्योगिक प्रदूषण जवाबदेही (Industrial Pollution Accountability) को लेकर सरकार को कटघरे में खड़ा कर दिया। उमेश पटेल ने स्पष्ट रूप से पूछा कि पिछले तीन वर्षों में बिना अनुमति राखड़ डंपिंग के कितने मामले आए और उन पर क्या ठोस कार्रवाई हुई। विडंबना देखिए, वित्त मंत्री ओपी चौधरी अपने ही विभाग और जिला प्रशासन द्वारा उपलब्ध कराए गए आंकड़ों के जाल में उलझ गए। उनके पास इस बात का कोई संतोषजनक जवाब नहीं था कि नियमों की धज्जियां उड़ाने वाले उद्योगों पर अब तक बड़ी कार्रवाई क्यों नहीं हुई।

कलेक्टर की नींद और ‘दिखावटी’ निरीक्षण

सदन में जब मंत्री जी की किरकिरी हुई और विपक्ष ने बहिर्गमन किया, तब जाकर रायगढ़ कलेक्टर ने आनन-फानन में औद्योगिक प्रदूषण जवाबदेही (Industrial Pollution Accountability)  सुनिश्चित करने के लिए अधिकारियों की टीम रवाना की। जिस कुंजेमुरा गांव में राखड़ की चादर बिछी हुई है, वहां छत्तीसगढ़ पर्यावरण संरक्षण मंडल का दल पहुंचा। सवाल यह उठता है कि क्या प्रशासन को विधानसभा में सवाल उठने का इंतजार था? क्या बिना राजनीतिक दबाव के रायगढ़ जिला प्रशासन और कलेक्टर जनता की स्वास्थ्य संबंधी शिकायतों को कचरे के डिब्बे में डाल देते हैं?

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जिंदल पावर प्लांट की मनमानी और सरकारी संरक्षण

निरीक्षण के दौरान टीम ने पाया कि ऐश डाइक (Industrial Pollution Accountability)  की स्थिति दयनीय है और वहां औद्योगिक प्रदूषण जवाबदेही के मानकों का पालन नहीं हो रहा है। ग्रामीणों का आरोप है कि जिंदल प्रबंधन प्रशासन के साथ सांठगांठ कर नियमों को ठेंगे पर रखता है। धूल नियंत्रण के लिए न तो जल छिड़काव किया जा रहा है और न ही हरित पट्टी का विकास हुआ है। क्या कलेक्टर और संबंधित विभाग के अधिकारी अब तक किसी बड़े ‘उपहार’ के बदले अपनी आँखें मूंदे हुए थे?

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आमजन के स्वास्थ्य से खिलवाड़

प्रशासन अब दावा कर रहा है कि आमजन के स्वास्थ्य से समझौता नहीं किया जाएगा, लेकिन धरातल पर सच्चाई इसके उलट है। रायगढ़ के तमनार और आसपास के क्षेत्रों में सांस की बीमारियां और फसल बर्बादी एक आम बात हो गई है। औद्योगिक प्रदूषण जवाबदेही (Industrial Pollution Accountability)  केवल कागजों तक सीमित रह गई है। अगर जिला प्रशासन वाकई गंभीर होता, तो अवैध डंपिंग करने वाली गाड़ियों और प्लांट प्रबंधन पर भारी जुर्माना लगाकर उनका संचालन बंद कराया गया होता।

राजनीतिक रसूख के आगे बेबस तंत्र

वित्त मंत्री ओपी चौधरी रायगढ़ से ही आते हैं, ऐसे में यह और भी शर्मनाक हो जाता है कि उनके अपने ही जिले में जनता प्रदूषण की मार झेल रही है और वे विधानसभा में औद्योगिक प्रदूषण जवाबदेही (Industrial Pollution Accountability)  पर स्पष्ट जवाब नहीं दे पा रहे हैं। विपक्ष का आरोप है कि बीजेपी सरकार उद्योगपतियों को खुली छूट दे रही है। उमेश पटेल के सवालों ने यह साबित कर दिया कि सरकार की कार्ययोजना केवल फाइलों में धूल फांक रही है, जबकि जनता राखड़ फांक रही है।

नोटिस का खेल और वैधानिक कार्यवाही का ढोंग

जिला प्रशासन ने फिर से वही घिसा-पिटा राग अलापा है कि ‘वैधानिक कार्यवाही की प्रक्रिया प्रारंभ की गई है’। रायगढ़ की जनता जानती है कि यह औद्योगिक प्रदूषण जवाबदेही (Industrial Pollution Accountability)  के नाम पर सिर्फ समय काटने की रणनीति है। जब तक मामला ठंडा नहीं हो जाता, तब तक दिखावे के लिए निरीक्षण होंगे और फिर वही ढाक के तीन पात। कलेक्टर को जवाब देना होगा कि अब तक उड़ने वाली धूल ने जिन बच्चों और बुजुर्गों के फेफड़े खराब किए, उसका जिम्मेदार कौन है?

Industrial Pollution Accountability  जवाबदेही किसकी

रायगढ़ जिला प्रशासन की यह ‘देर से जागी नींद’ दर्शाती है कि यहां तंत्र जनहित के बजाय रसूखदारों के दबाव में काम कर रहा है। वित्त मंत्री ओपी चौधरी को अपनी छवि बचाने के लिए अब केवल भाषण नहीं, बल्कि ठोस औद्योगिक प्रदूषण जवाबदेही सुनिश्चित करनी होगी। क्या रायगढ़ कलेक्टर उन कंपनियों के खिलाफ एफआईआर दर्ज कराने का साहस दिखाएंगे जो खुलेआम नियमों की धज्जियां उड़ा रही हैं? या फिर अगली विधानसभा में फिर से किसी मंत्री को शर्मिंदा होना पड़ेगा?

 

 

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