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Ragi Farming : धान से हटकर रागी पर दांव, 193 हेक्टेयर में फैली खेती ने किसानों की आय का गणित बदला

Sustainable Agriculture : प्रदेश में कृषि विविधिकरण (Ragi Farming) की नई तस्वीर उभर रही है। किसान परम्परागत धान फसल के साथ-साथ फसल चक्र परिवर्तन को अपनाते हुए दलहन, तिलहन एवं लघु धान्य फसलों (कोदो, रागी) की खेती की ओर अग्रसर हो रहे हैं। ग्रीष्मकालीन धान के स्थान पर अब अन्य फसलों के साथ-साथ रागी की खेती में बढ़ती भागीदारी से सकारात्मक बदलाव दिखाई दे रहा है।

यह परिवर्तन न केवल किसानों की आय बढ़ाने में सहायक बन रहा है बल्कि भूमि की उर्वरता संरक्षण और जल संसाधनों के संतुलित उपयोग में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभा रहा है। खेती के इस बदलाव में रागी की खेती (Ragi Farming) किसानों के लिए बेहतर विकल्प बनकर उभर रही है।

193 हेक्टेयर क्षेत्र में रागी की खेती

कृषि विभाग से प्राप्त जानकारी के अनुसार वर्तमान रबी सीजन में लगभग 193 हेक्टेयर क्षेत्र में रागी की खेती किसानों द्वारा की जा रही है। राष्ट्रीय कृषि विकास योजना अंतर्गत विभिन्न ग्रामों में रागी की खेती का विस्तार हुआ है। जिला प्रशासन एवं कृषि विभाग द्वारा किसानों को तकनीकी मार्गदर्शन, गुणवत्तापूर्ण बीजों की उपलब्धता और प्रशिक्षण के माध्यम से वैकल्पिक फसलों की खेती के लिए निरंतर प्रयास किए जा रहे हैं। अधिकारियों का कहना है कि रागी की खेती (Ragi Farming) से खेती में जोखिम कम होता है और किसानों को मौसम के उतार-चढ़ाव से सुरक्षा मिलती है।

इन गांवों में हो रही खेती Ragi Farming

बलौदाबाजार जिले में राष्ट्रीय कृषि विकास योजना अंतर्गत विकासखण्ड भाटापारा के ग्राम सेमराडीह, सिंगारपुर, निपनिया, कुम्हारखान सहित अन्य ग्रामों में रागी की खेती की जा रही है। उप संचालक कृषि दीपक कुमार नायक के मार्गदर्शन में लगाए गए रागी फसल प्रदर्शन का निरीक्षण कृषि विभाग के अधिकारियों द्वारा किया गया। अधिकारियों ने कृषक नन्दराम वर्मा के खेत में पहुंचकर रागी फसल की वृद्धि, पोषण प्रबंधन की स्थिति एवं उत्पादन संभावनाओं का अवलोकन किया। निरीक्षण के दौरान अधिकारियों ने किसानों को संतुलित उर्वरक उपयोग, समय पर सिंचाई एवं कीट-रोग प्रबंधन के संबंध में आवश्यक मार्गदर्शन प्रदान किया और बताया कि रागी की खेती (Ragi Farming) से आय के स्थायी विकल्प विकसित हो रहे हैं।

रागी खाने से कई स्वास्थ्य लाभ Sustainable Agriculture

उल्लेखनीय है कि रागी खाने से कई स्वास्थ्य लाभ होते हैं। इससे बनी रोटियां शुगर, बीपी और कुपोषण जैसी समस्याओं से जूझ रहे लोगों के लिए फायदेमंद हैं। खासतौर पर कुपोषित बच्चों को रागी खिलाने से पोषण की कमी पूरी हो जाती है। मिलेट (रागी) बदलते मौसम की स्थिति का सामना कर सकता है, कम इनपुट की आवश्यकता होती है, कम अवधि में बढ़ता है और लगभग सभी प्रकार की मिट्टी में अच्छी तरह से ढल जाता है। विशेषज्ञों का कहना है कि पोषण सुरक्षा के साथ किसानों की आय बढ़ाने में रागी की खेती (Ragi Farming) की भूमिका लगातार मजबूत हो रही है।

इस दौरान वरिष्ठ कृषि विकास अधिकारी अवधेश उपाध्याय, कृषि विकास अधिकारी हरीकिशन महिलांग, ग्रामीण कृषि विस्तार अधिकारी खिलेश डिन्डेकर एवं एग्रीकल्चर टेक्नोलॉजी मैनेजर मुकेश तिवारी उपस्थित रहे। अधिकारियों ने किसानों से संवाद कर रागी, कोदो तथा अन्य मिलेट फसलों के विस्तार की योजना पर चर्चा की और आने वाले सीजन में अधिक क्षेत्र कवर करने की रणनीति भी साझा की, जिससे रागी की खेती (Ragi Farming) को और गति मिल सके।

 

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