Saria Tehsildar : भ्रष्टाचार की भेंट चढ़ा तहसीलदार का आदेश, बेदखली के नाम पर ‘लेनदेन’ और ‘ठंडे बस्ते’ का खेल!

Sarangarh-Bilaigarh News : न्याय की कुर्सी पर बैठकर जब रक्षक ही भक्षक (Saria Tehsildar) की भूमिका निभाने लगे, तो आम जनता कहां जाए? सरिया तहसील कार्यालय में इन दिनों ‘अंधेर नगरी चौपट राजा’ वाली स्थिति निर्मित हो गई है। छत्तीसगढ़ के सांरगढ़-बिलाईगढ़ जिले के न्यायालय तहसीलदार सरिया द्वारा ग्राम गोबरसिंघा में अवैध अतिक्रमण हटाने का आदेश तो पारित किया गया, लेकिन वह आदेश अब फाइलों के ढेर में दबकर दम तोड़ रहा है। चर्चा है कि इस देरी के पीछे कोई ‘बड़ा लेनदेन’ है, जिसने कानून के हाथ बांध दिए हैं।आदेश का ‘तमाशा’ और प्रशासन का ‘मौन’
राजस्व प्रकरण क्रमांक 202403320800018 / अ-68 / 2023-24 के तहत तहसीलदार (Saria Tehsildar) ने यह स्वीकार किया था कि खसरा नंबर 666/1 पर अतिक्रमणकारी ने अवैध रूप से मकान बनाकर कब्जा किया है। 29 मई 2025 को बेदखली का आदेश भी जारी हुआ। लेकिन विडंबना देखिए, एक साल बीतने को है और तहसीलदार साहब को फुर्सत नहीं मिली कि वे अपने ही आदेश का पालन करवा सकें। क्या यह केवल लापरवाही है या भ्रष्टाचार की गहरी जड़ें।
क्या चांदी के सिक्कों ने रोक दी जेसीबी
आरोप लग रहे हैं कि तहसीलदार कार्यालय ने अतिक्रमणकारी से ‘साठगांठ’ कर ली है। जब भी कार्रवाई की बात आती है, तो प्रशासन सुस्ती ओढ़ लेता है। 26 सितंबर 2025 को जारी किया गया अंतिम नोटिस केवल एक ‘कागजी खानापूर्ति’ नजर आता है। जनता अब सीधे सवाल पूछ रही है कि जब बेदखली का आदेश मई में हुआ, तो सितंबर तक इंतजार क्यों किया गया।
क्या अतिक्रमणकारी की पहुंच कानून से भी ऊपर है। कितने के ‘लेनदेन’ में कानून की गरिमा को ठंडे बस्ते में डाल दिया गया। तहसीलदार (Saria Tehsildar) के हस्ताक्षर और सील लगे नोटिस अब केवल रद्दी का टुकड़ा बनकर रह गए हैं। राजस्व निरीक्षक और पटवारी हल्का नंबर 07 को निर्देशित करने के बावजूद जमीनी स्तर पर एक पत्थर भी नहीं हिला। यह न केवल प्रशासनिक विफलता है, बल्कि उस पद की तौहीन है जिस पर बैठकर न्याय की उम्मीद की जाती है।
नहीं उठाया फोन Saria Tehsildar
सरिया तहसीलदार कोमल प्रसाद साहू से इस संबंध में चर्चा करने के लिए हमारे संवाददाता द्वारा उनके मोबाइल नंबर पर संपर्क किया गया, लेकिन मोबाइल की घंटी बजती रही। उन्होंने कोई रिस्पांस नहीं दिया। स्थानीय लोगों की मानें तो साहब का रवैय्या इसी तरह का होता है। गिने चुने नेताओं के ही फोन साहेब उठाते हैं। आम जनता या पत्रकारों के फोन को रिस्पांस नहीं दिया जाता है।