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Thackeray Brothers : 20 साल बाद ठाकरे ब्रदर्स मिलाएंगे ‘हाथ’, बढ़ गई शिंदे की धड़कनें, मंच छोड़कर भागे!

Bmc Elections : महाराष्ट्र की राजनीति (Thackeray Brothers) में एक बार फिर हलचल मची है। शिवसेना (UBT) प्रमुख उद्धव ठाकरे और महाराष्ट्र नवनिर्माण सेना (MNS) के अध्यक्ष राज ठाकरे के संभावित एकजुट होने की अटकलें तेज हो गई हैं। 20 साल बाद दोनों भाइयों के बीच सुलह की संभावनाओं ने सियासी गलियारों में नई बहस छेड़ दी है। सवाल यह है कि क्या यह केवल दिखावा है या वास्तव में राज्य की राजनीति का समीकरण बदलने वाला है?

ठाकरे परिवार (Thackeray Brothers) की राजनीतिक विरासत

महाराष्ट्र में ठाकरे परिवार का प्रभाव हमेशा से जबरदस्त रहा है। मराठी अस्मिता, हिंदुत्व और शहरी वोटबैंक पर इनकी पकड़ मजबूत रही है। बाल ठाकरे के बाद उद्धव और राज ठाकरे ने अलग-अलग राहें चुनीं। 2006 में मतभेदों के चलते राज ने शिवसेना छोड़कर MNS की स्थापना की। आक्रामक शैली के चलते वे लोकप्रिय तो हुए, लेकिन अपनी पार्टी को बड़ी ताकत नहीं बना सके।

वहीं उद्धव ने शिवसेना की बागडोर संभाली और 2019 में बीजेपी से अलग होकर कांग्रेस-एनसीपी के साथ महाविकास अघाड़ी (MVA) सरकार बनाई। हालांकि, इसका नुकसान यह हुआ कि कुछ हिंदुत्व समर्थक उनसे नाराज हो गए।

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MNS का अस्तित्व संकट (Thackeray Brothers)

हाल के विधानसभा चुनाव में मनसे का प्रदर्शन बेहद निराशाजनक रहा। पार्टी एक भी सीट नहीं जीत सकी और अब अपने चुनाव चिह्न ‘रेल इंजन’ को भी खोने का खतरा मंडरा रहा है। दूसरी ओर, शिवसेना (UBT) भी दबाव में है। 2022 में एकनाथ शिंदे की बगावत के बाद उद्धव गुट कमजोर पड़ा और अब BMC जैसे अहम चुनावों में उसे अपनी साख बचानी है।

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उद्धव और राज की हालिया बयानबाजी

मुंबई में एक रैली में उद्धव ठाकरे (Thackeray Brothers) ने कहा कि वे छोटे-मोटे विवाद भुलाकर महाराष्ट्र और मराठी हित के लिए सभी को एकजुट करने को तैयार हैं। वहीं, राज ठाकरे ने महेश मांजरेकर को दिए इंटरव्यू में कहा कि उनके और उद्धव के बीच की लड़ाइयां मामूली हैं और महाराष्ट्र के भविष्य के लिए बड़े हितों को प्राथमिकता देनी चाहिए। दोनों नेताओं ने मराठी अस्मिता को केंद्र में रखकर संकेत दिए कि वे पुराने गिले-शिकवे भुलाकर एक साथ आ सकते हैं।

बीएमसी चुनाव की अहमियत (Thackeray Brothers)

तीन साल से लंबित बृहन्मुंबई नगर निगम (BMC) चुनाव इस अक्टूबर में हो सकते हैं। बीएमसी, जिसे शिवसेना का गढ़ माना जाता है, पर कब्जे के लिए एनडीए और शिवसेना (UBT) दोनों पूरी ताकत झोंक रहे हैं। अगर मनसे और उद्धव गुट साथ आते हैं तो बीजेपी-शिंदे गुट को मुंबई और ठाणे में बड़ा झटका लग सकता है, जहां मराठी वोटबैंक निर्णायक भूमिका निभाता है।

शिंदे की नाराजगी क्यों (Thackeray Brothers)

हाल ही में जब पत्रकारों ने एकनाथ शिंदे से ठाकरे भाइयों के संभावित गठबंधन पर सवाल पूछा तो वे गुस्सा हो गए और बिना जवाब दिए मंच छोड़ दिया। राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि शिंदे की चिंता वाजिब है। अगर राज और उद्धव साथ आते हैं तो शिंदे गुट को मराठी वोटबैंक में जबरदस्त नुकसान उठाना पड़ सकता है। खासकर ठाणे और मुंबई जैसे इलाकों में, जहां मनसे की पकड़ अच्छी मानी जाती है।

अंदरखाने महायुति में तनाव (Thackeray Brothers)

बीजेपी, शिंदे गुट और अजित पवार गुट के महायुति गठबंधन में भी सब कुछ ठीक नहीं है। एकनाथ शिंदे और बीजेपी के बीच टकराव की खबरें लंबे समय से आ रही हैं। अगर राज ठाकरे महायुति छोड़कर उद्धव के साथ आते हैं तो यह शिंदे के लिए दोहरी मुश्किल होगी—बीजेपी से दूरी और मनसे के वोटबैंक का नुकसान।

क्या सचमुच एकजुट होंगे ठाकरे भाई (Thackeray Brothers)

अब सवाल यही है कि क्या वाकई ठाकरे ब्रदर्स पुरानी दुश्मनी भुलाकर एकजुट होंगे या यह सिर्फ रणनीतिक बयानबाजी है? हालात चाहे जैसे भी हों, इतना तय है कि अगर दोनों साथ आए तो महाराष्ट्र की राजनीति में बड़ा उलटफेर हो सकता है। इससे न केवल बीएमसी चुनावों पर असर पड़ेगा, बल्कि 2029 के विधानसभा चुनावों के समीकरण भी पूरी तरह बदल सकते हैं।

 

 

 

 

 

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