
अफसरों तक पहुंच रहा है पैसा…! बिना तिरपाल ढंके मौत बनकर सड़कों पर दौड़ रहे कोयला लोड ट्रक
रायगढ़ और सारंगढ़-बिलाईगढ़ जिलों की सड़कें इस समय विकास का नहीं, बल्कि भ्रष्टाचार, लापरवाही और सरकारी तंत्र की आपराधिक मिलीभगत का नग्न नाच दिखा रही हैं। नियमों को ताक पर रखकर, बिना तिरपाल ढंके, यमराज बनकर दौड़ रहे कोयला और खनिज से लदे ट्रक आम जनता की जिंदगी के साथ खुला खिलवाड़ कर रहे हैं। बरमकेला-सोहेला ओडिशा मार्ग हो या रायगढ़-चंद्रपुर रोड, हर जगह उड़ता हुआ कोयले का काला धुआं और सड़कों पर बिखरा कचरा इस बात की चीख-चीखकर गवाही दे रहा है कि जिले में कानून का राज नहीं, बल्कि अवैध परिवहन माफियाओं और भ्रष्ट तंत्र का अघोषित जंगलराज कायम है।
सिस्टम का बेशर्म मौन
जब इन नियमों की धज्जियां उड़ाने वाले ट्रकों के चालकों से सवाल किया जाता है, तो उनका जवाब पूरे प्रशासनिक तंत्र के चेहरे पर एक जोरदार तमाचा है। चालकों की यह हिम्मत कोई इत्तेफाक नहीं है; इसके पीछे खनिज विभाग, राजस्व विभाग से लेकर बरमकेला और डोंगरीपाली थाने के भ्रष्ट अधिकारियों की वह सांठगांठ है, जो हफ्ताखोरी और अवैध वसूली के दम पर इन पर मेहरबान है। चालकों का यह कहना कि “खनिज विभाग, राजस्व विभाग और पुलिस से लेकर सभी बड़े अफसरों तक पैसा पहुंच रहा है, जहां शिकायत करना है करो और जो छापना है छाप लो,” इस व्यवस्था की सड़न का खुला कबूलनामा है। यह सिर्फ एक बयान नहीं, बल्कि खाकी और खादी के संरक्षण में पल रहे उस माफिया तंत्र का खुला अहंकार है, जो आम आदमी की जान की कोई कीमत नहीं समझता।
मौत के साए में जीने को मजबूर आम जनता
रायगढ़ जिले की खदानों से निकलने वाले ये ओवरलोड ट्रक और सारंगढ़-बिलाईगढ़ क्षेत्र में संचालित दर्जनों क्रशर खदानों से फर्राटा भरते भारी वाहन सड़कों पर मौत बनकर दौड़ रहे हैं। बिना तिरपाल ढंके कोयला ढोने के कारण जब हवा चलती है, तो कोयले के बारीक कण आसपास के राहगीरों, दोपहिया चालकों और स्कूली बच्चों की आंखों और फेफड़ों में समा जाते हैं। सड़कों पर गिरते कोयले के टुकड़े पीछे आ रहे वाहनों के लिए भीषण सड़क हादसों का सबब बनते हैं। आए दिन मासूम लोग अपनी जान गंवा रहे हैं, परिवार उजड़ रहे हैं, लेकिन शासन-प्रशासन के कानों पर जूं तक नहीं रेंगती।
जनहित और मीडिया के प्रति दुस्साहस
सबसे शर्मनाक पहलू यह है कि जब इस गंभीर और जानलेवा लापरवाही पर जिम्मेदार अधिकारियों से संपर्क साधने की कोशिश की जाती है, तो वे अपनी जिम्मेदारी से मुंह मोड़ लेते हैं। फोन कॉल्स का जवाब न देना इस बात का स्पष्ट प्रमाण है कि ये अधिकारी अपनी मिलीभगत और भ्रष्टाचार के गुनाहों को छुपाने के लिए कायरों की तरह बिल में छिप गए हैं। क्या जनता के खून-पसीने की कमाई से वेतन पाने वाले ये अफसर इसी दिन के लिए कुर्सियों पर बैठे हैं कि वे माफियाओं से मोटी रकम ऐंठकर आम जनता को मौत के मुंह में धकेल दें?
अब चुप बैठना अपराध है!
यह वक्त खामोश रहने का नहीं है। सवाल सिर्फ नियमों के उल्लंघन का नहीं है, बल्कि उस खोखले और भ्रष्ट प्रशासनिक ढांचे का है, जो चंद रुपयों की रिश्वत के खातिर इंसानी जिंदगियों का सौदा कर रहा है। यदि समय रहते इन लापरवाह अधिकारियों पर सख्त से सख्त कार्रवाई नहीं की गई और अवैध ओवरलोडिंग पर नकेल नहीं कसी गई, तो जनता का आक्रोश सड़कों पर फूटेगा, जिसकी जिम्मेदारी शासन और प्रशासन की होगी। कोयले की इस काली कालिख से सिर्फ सड़कें नहीं, बल्कि पूरे सिस्टम का दामन दागदार हो चुका है, जिसे अब जनता के तीखे सवालों और कानूनी चाबुक से ही साफ किया जा सकता है।




