छत्तीसगढ़

Baramkela Water Crisis : रेगिस्तान बनने की कगार पर बरमकेला, 800 फीट नीचे पाताल में उतरा पानी

Sarangarh Bilaigarh District News : छत्तीसगढ़ का बरमकेला (Baramkela Water Crisis) ब्लॉक इन दिनों भीषण जल संकट की आग में झुलस रहा है। हालात इस कदर बेकाबू हो चुके हैं कि भूगर्भ जलस्तर (वाटर लेवल) खिसककर 500 से 800 फीट की डरावनी गहराई तक नीचे गिर गया है। जमीन के भीतर पानी सूखने से क्षेत्र के अधिकांश बोरवेल और हैंडपंपों ने पूरी तरह दम तोड़ दिया है। पानी के बेतहाशा और अंधाधुंध दोहन के कारण इस पूरे ब्लॉक को ‘क्रिटिकल जोन’ घोषित कर दिया गया है। सरकारी रिपोर्ट के चौंकाने वाले आंकड़ों के मुताबिक, इस क्षेत्र का 90 प्रतिशत भूजल खत्म हो चुका है और अब जमीन के नीचे केवल 10 प्रतिशत पानी ही शेष बचा है।

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जल जीवन मिशन फेल, बूंद-बूंद को तरस रहे ग्रामीण

सारंगढ़-बिलाईगढ़ जिले के गांवों (Baramkela Water Crisis) की जमीनी हकीकत शासन-प्रशासन के कागजी दावों का मुंह चिढ़ा रही है। केंद्र और राज्य सरकार की महत्वाकांक्षी योजना ‘जल जीवन मिशन’ के तहत गांवों में लाखों-करोड़ों की लागत से पानी की विशाल टंकियां तो खड़ी कर दी गई हैं और पाइपलाइन भी बिछा दी गई है, लेकिन नलों से पानी गायब है।

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महानदी से पानी (Baramkela Water Crisis)  लाकर क्षेत्र की प्यास बुझाने वाली वृहद जलापूर्ति योजना सालों बाद भी धरातल पर नहीं उतर सकी है। भीषण गर्मी के इस मौसम में ग्रामीण एक-एक बूंद पानी के लिए मीलों का सफर तय करने को मजबूर हैं। कई गांवों में सैकड़ों की आबादी सिर्फ एक ही चालू जल स्रोत (बोर या कुएं) के भरोसे है, जहां पानी के लिए सुबह से ही बर्तनों की लंबी कतारें लग जाती हैं।

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फरवरी से ही शुरू हो गया था पाताल का सफर

भूजल विशेषज्ञों के अनुसार, इस साल फरवरी महीने की शुरुआत से ही वाटर लेवल (Baramkela Water Crisis)  तेजी से गिरना शुरू हो गया था, जिसके आगामी जून महीने तक और ज्यादा नीचे जाने की प्रबल आशंका है। विशेषज्ञों ने चेतावनी दी है कि यदि जल संरक्षण को लेकर तुरंत कोई क्रांतिकारी और ठोस कदम नहीं उठाए गए, तो आने वाले 10 वर्षों में यह पूरा इलाका डार्क जोन में तब्दील हो जाएगा और यहां इंसानी आबादी का रहना दूभर हो जाएगा।

धान की बेतहाशा खेती बनी बर्बादी की वजह

लोक स्वास्थ्य यांत्रिकी विभाग (PHE) के कार्यपालन अभियंता रमाशंकर कश्यप ने बताया कि बरमकेला ब्लॉक (Baramkela Water Crisis) सेमी क्रिटिकल से क्रिटिकल जोन की तरफ बढ़ रहा है। ग्रीष्मकाल में वाटर लेवल पाताल में चले जाने का सबसे बड़ा कारण क्षेत्र में रबी सीजन के दौरान बड़े पैमाने पर की जाने वाली धान की खेती है।

धान की फसल में पानी की खपत बहुत ज्यादा होती है, जिसके लिए दिन-रात खेतों में हैवी मोटर चलाकर भूजल को खींचा जा रहा है। उन्होंने सुझाव दिया कि यदि बरमकेला को बचाना है, तो किसानों को फसल चक्र अपनाते हुए धान के बदले दलहन (दालें) और तिलहन जैसी कम पानी वाली फसलों की ओर रुख करना होगा।

 

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Baramkela Water Crisis 102 गांवों में काम चलने का दावा

इधर, चौतरफा घिरे विभागीय अधिकारियों का दावा है कि वर्तमान में संकट से निपटने के लिए 102 गांवों में सामूहिक जलप्रदाय योजना पर तेजी से काम किया जा रहा है। विभाग का कहना है कि महानदी आधारित इस योजना के पूरा होते ही सभी प्रभावित गांवों में पानी की किल्लत हमेशा के लिए दूर हो जाएगी।

हालांकि, वर्तमान में बूंद-बूंद पानी के लिए तरस रही जनता प्रशासन की इस कछुआ चाल और सुस्ती पर उग्र हो रही है। यदि समय रहते जल संरक्षण और फसल पद्धतियों में बदलाव नहीं किया गया, तो बरमकेला को आने वाले दिनों में प्यासा रहने से कोई नहीं बचा पाएगा।

 

 

 

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