Hilsa Politics : चुनावी मौसम में पश्चिम बंगाल की सियासत (Hilsa Politics) इस बार एक अलग ही मोड़ लेती नजर आ रही है। यहां मतदाताओं के सामने कई मुद्दे मौजूद हैं। कुछ स्थानीय, कुछ राष्ट्रीय और कुछ अंतरराष्ट्रीय स्तर के भी। लेकिन इस बार बहस का केंद्र आम जनता के बुनियादी सवालों से हटकर उनकी थाली तक पहुंच गया है। अब लोगों से यह सोचने को कहा जा रहा है कि अगर सत्ता परिवर्तन हुआ, तो उनके खाने-पीने, खासकर मछली और मटन पर क्या असर पड़ेगा। यानी चुनावी विमर्श अब रोजमर्रा की जरूरतों से हटकर खान-पान तक जा पहुंचा है।
इस पूरे विवाद के केंद्र में है हिलसा मछली, जो दिल्ली जैसे शहरों में 1500 रुपये प्रति किलो तक बिकती है और अब बंगाल की राजनीति में इतना अहम मुद्दा बन चुकी है कि इसे चुनाव जिताने और हराने वाला फैक्टर (Hilsa Politics) माना जा रहा है।
पश्चिम बंगाल और हिलसा का गहरा रिश्ता
पश्चिम बंगाल में हिलसा (इलिश) सिर्फ एक मछली नहीं, बल्कि संस्कृति, परंपरा और पहचान का हिस्सा है। इसे ‘मछलियों की रानी’ कहा जाता है और बंगाली समाज में इसका विशेष महत्व है।
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हिलसा का उत्पादन कम हुआ Hilsa Politics
हालांकि पिछले एक दशक में पश्चिम बंगाल में हिलसा का उत्पादन कम हुआ है। 2020-21 के आंकड़ों के मुताबिक गंगा में इसकी उपलब्धता में 15-20% तक गिरावट आई है। मांग और आपूर्ति के अंतर के कारण राज्य के बाजारों में हिलसा की कीमत ₹1200 से ₹3000 प्रति किलो तक पहुंच चुकी है। वर्ल्ड बैंक के अनुसार, पश्चिम बंगाल में हर साल करीब 8.36 लाख टन मछली की खपत होती है, जो राष्ट्रीय औसत से लगभग दोगुनी है।
चुनाव में कैसे हुई Hilsa Politics की एंट्री
मछली-भात के मुद्दे को सबसे पहले ममता बनर्जी (Mamata Banerjee) और उनकी पार्टी All India Trinamool Congress ने चुनावी मंचों पर उठाया। एक रैली में ममता बनर्जी ने आरोप लगाया कि अगर भाजपा (Bharatiya Janata Party) सत्ता में आती है, तो लोगों को मछली, मांस और अंडा खाने में दिक्कत हो सकती है।
उन्होंने कहा कि, “वे आपको मछली नहीं खाने देंगे, मांस और अंडा भी नहीं खाने देंगे, यहां तक कि आपकी भाषा पर भी सवाल उठाया जाएगा। माना जा रहा है कि BJP की घुसपैठिया राजनीति के जवाब में TMC ने इस मुद्दे को बंगाल की अस्मिता से जोड़ते हुए Hilsa Politics को धार दी है। अब यह बहस सिर्फ खाने की पसंद नहीं, बल्कि पहचान और संस्कृति की लड़ाई (Hilsa Politics) बन गई है। जहां यह तय करने की होड़ है कि ‘असल बंगाली’ कौन है।
रैलियों में ‘माछ-भात’ बना चुनावी नारा
TMC की रणनीति का असर जमीनी प्रचार में भी साफ दिख रहा है। चुनावी रैलियों में अब झंडों के साथ-साथ ‘कतला’, ‘हिलसा’, ‘पाबदा’ और ‘चिंगड़ी’ मछलियों के प्रतीक भी दिखाई दे रहे हैं। ‘माछ-भात बंगाली’ इस चुनाव में लगभग सभी दलों का अनौपचारिक नारा बन चुका है, जो सीधे मतदाताओं की भावनाओं को जोड़ने की कोशिश है।
BJP को करना पड़ रहा जवाब
TMC के इस नैरेटिव का दबाव अब BJP पर भी दिख रहा है। पार्टी लगातार यह स्पष्ट कर रही है कि मछली या मांस पर किसी प्रकार का प्रतिबंध लगाने का कोई प्रस्ताव नहीं है। स्थिति ऐसी बन गई है कि BJP को सार्वजनिक रूप से यह बताना पड़ रहा है कि वह ‘मछली विरोधी’ नहीं है और चुनावी बहस को असली मुद्दों पर केंद्रित रखना चाहती है।
नरेंद्र मोदी (Narendra Modi) ने भी उठाया मुद्दा
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने अपनी एक रैली में मछली उत्पादन का मुद्दा उठाते हुए कहा कि पश्चिम बंगाल अभी इस क्षेत्र में आत्मनिर्भर नहीं है उन्होंने Haldia में रैली के दौरान कहा कि बिहार और असम जैसे राज्यों में मछली उत्पादन तेजी से बढ़ा है और वे आत्मनिर्भर बन चुके हैं। उन्होंने यह भी कहा कि पश्चिम बंगाल को भी इस दिशा में और प्रयास करने की जरूरत है।
सीएम ममता बनर्जी का पलटवार
मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने प्रधानमंत्री के दावों का जवाब देते हुए कहा कि राज्य में हिलसा की उपलब्धता बेहतर हुई है और इसके लिए सरकार ने ठोस कदम उठाए हैं। उन्होंने बताया कि Diamond Harbour में हिलसा के लिए एक रिसर्च सेंटर बनाया गया है, जिससे उत्पादन और संरक्षण को बढ़ावा मिलेगा।
इसके साथ ही मछुआरों के लिए ‘मत्स्यजीवी कार्ड’ जैसी योजनाएं भी लागू की गई हैं। उन्होंने आरोप लगाया कि BJP सत्ता में आने पर लोगों की खान-पान की स्वतंत्रता प्रभावित कर सकती है और इसी मुद्दे को लेकर उन्होंने जनता से समर्थन मांगा।
क्या मछली बदल देगी चुनावी नतीजे
फिलहाल यह कहना मुश्किल है कि Hilsa Politics विधानसभा चुनावों में कितना असर डालेगी। लेकिन इतना तय है कि बंगाली समाज में मछली सिर्फ भोजन नहीं, बल्कि भावनात्मक और सांस्कृतिक पहचान का हिस्सा है। बंगाल के लोग महंगाई, खराब सड़कें, लेट ट्रेनें और आर्थिक चुनौतियां सहन कर सकते हैं, लेकिन अगर उनकी थाली और खान-पान (Hilsa Politics) पर असर पड़ता है, तो यह बड़ा चुनावी मुद्दा बन सकता है। यही वजह है कि इस बार बंगाल चुनाव में मछली सिर्फ बाजार में नहीं, बल्कि राजनीति के केंद्र में तैरती नजर आ रही है।

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