Anti-Naxal Operation : दशक भर की चोट से टूटा माओवाद का दम, 10 हजार से अधिक कैडरों ने डाले हथियार

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Anti-Naxal Operation

Maoist Surrender 2026 : देश के सबसे लंबे और घातक आंतरिक विद्रोह, माओवाद (Anti-Naxal Operation) के खिलाफ भारत सरकार की निर्णायक जंग अब अपने अंतिम चरण में पहुंच चुकी है। गृह मंत्रालय द्वारा चलाए जा रहे नक्सल विरोधी अभियान (Anti-Naxal Operation) के रणनीतिक दबाव और प्रभावी पुनर्वास नीतियों का परिणाम है कि पिछले एक दशक में 10,000 से अधिक माओवादियों ने हिंसा का रास्ता छोड़कर मुख्यधारा में वापसी की है। केंद्र सरकार ने अब देश से माओवाद को पूरी तरह जड़ से समाप्त करने के लिए 31 मार्च, 2026 की समयसीमा निर्धारित की है।

आंकड़ों में दिख रहा है सुरक्षा बलों का दबदबा

आधिकारिक आंकड़े गवाह हैं कि सरकारी नीतियों ने नक्सलियों के आधार को हिला कर रख दिया है। नक्सल विरोधी अभियान (Anti-Naxal Operation) के तहत साल 2025 में रिकॉर्ड 2,300 माओवादियों ने आत्मसमर्पण किया। यह सिलसिला थमा नहीं है, बल्कि 2026 के पहले तीन महीनों में ही 630 से अधिक कैडरों ने सशस्त्र विद्रोह को तिलांजलि दे दी है। यह संख्या दर्शाती है कि माओवादी विचारधारा अब अपने ही गढ़ों में नेतृत्वविहीन और कमजोर हो चुकी है।

‘रेड कॉरिडोर’ का खात्मा और बुनियादी ढांचे का विकास

एक समय था जब ‘पशुपति से तिरुपति’ तक एक विशाल नक्सली आर्क फैला हुआ था, जिसे “रेड कॉरिडोर” कहा जाता था। छत्तीसगढ़, बिहार, झारखंड, ओडिशा और महाराष्ट्र जैसे राज्यों के दुर्गम क्षेत्रों में विकास कार्य करना नामुमकिन था। नक्सल विरोधी अभियान (Anti-Naxal Operation) की सफलता के पीछे केवल बंदूकें नहीं, बल्कि विकास की मशीनें भी हैं। जहां निजी ठेकेदार काम करने से डरते थे, वहां केंद्र ने बॉर्डर रोड्स ऑर्गनाइजेशन (BRO) को जिम्मेदारी सौंपी।

नतीजतन, पिछले 10 वर्षों में माओवाद प्रभावित क्षेत्रों में 12,250 किलोमीटर सड़कों का निर्माण पूरा किया गया है। दुर्गम इलाकों में नक्सल विरोधी अभियान (Anti-Naxal Operation) को गति देने के लिए 68 नाइट-लैंडिंग हेलिपैड और 361 नए सुरक्षा शिविर स्थापित किए गए हैं।

सिमटता दायरा :  76 से 22 जिलों तक पहुंचा माओवाद

रणनीतिक सफलता का सबसे बड़ा पैमाना भौगोलिक विस्तार में कमी है। साल 2013 में देश के 76 जिलों के 330 पुलिस स्टेशन माओवादी हिंसा की रिपोर्ट करते थे। नक्सल विरोधी अभियान (Anti-Naxal Operation) के चलते जून 2025 तक यह आंकड़ा घटकर केवल 22 जिलों के 52 पुलिस स्टेशनों तक सीमित रह गया है। सुरक्षित पुलिस स्टेशनों की संख्या भी 2014 के मात्र 66 से बढ़कर अब 586 हो गई है, जिससे सुरक्षा बलों की पकड़ और मजबूत हुई है।

नेतृत्वविहीन हुआ आंदोलन, योजनाओं का पहुंचा लाभ

सरकार की ‘सुरक्षा दबाव और पुनर्वास’ की दोहरी रणनीति ने आंदोलन के मूल ढांचे को ध्वस्त कर दिया है। नक्सल विरोधी अभियान (Anti-Naxal Operation) के माध्यम से सुरक्षा बलों ने बड़े नेताओं को या तो गिरफ्तार किया या उन्हें आत्मसमर्पण के लिए मजबूर कर दिया। दूसरी ओर, शिक्षा और बुनियादी ढांचे में भारी निवेश ने स्थानीय ग्रामीणों का भरोसा जीता है। अब सरकारी योजनाओं का लाभ सीधे आम लोगों तक पहुंच रहा है, जिससे माओवादियों को मिलने वाला स्थानीय समर्थन पूरी तरह खत्म हो गया है।

 

एक नए युग की शुरुआत Anti-Naxal Operation

31 मार्च की समयसीमा के साथ, नक्सल विरोधी अभियान (Anti-Naxal Operation) अब अपने निर्णायक मोड़ पर है। सुरक्षा बलों का निरंतर दबाव और विकास की पहुंच यह सुनिश्चित कर रही है कि आने वाले समय में ‘लाल आतंक’ का नामोनिशान मिट जाए। नक्सल विरोधी अभियान (Anti-Naxal Operation) की यह सफलता न केवल सुरक्षा की जीत है, बल्कि उन हजारों युवाओं के लिए एक नया अवसर भी है जिन्होंने हिंसा छोड़ शांति का रास्ता चुना है। गृह मंत्रालय की इस सख्त और समावेशी नीति ने यह साबित कर दिया है कि नक्सल विरोधी अभियान (Anti-Naxal Operation) के जरिए देश के आंतरिक सुरक्षा परिदृश्य को पूरी तरह बदला जा सकता है।

 

 


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