Chhattisgarh News : प्रदेश में किसानों का रुझान तेजी से जैविक एवं प्राकृतिक खेती (Chhattisgarh Organic Farming) की ओर बढ़ रहा है। राष्ट्रीय प्राकृतिक खेती मिशन के तहत रसायन मुक्त कृषि को बढ़ावा देने के लिए शासन द्वारा निरंतर प्रयास किए जा रहे हैं, जिसका सकारात्मक असर अब जमीनी स्तर पर दिखाई देने लगा है। जैविक खेती (Chhattisgarh Organic Farming) के माध्यम से किसान न केवल खेती की लागत घटा रहे हैं, बल्कि आय में भी उल्लेखनीय वृद्धि कर रहे हैं।
राजनांदगांव विकासखंड के ग्राम मोखला निवासी कृषक दंपत्ति मनभौतिन बाई निषाद एवं उनके पति माखन निषाद इसकी सशक्त मिसाल बनकर सामने (Chhattisgarh Organic Farming) आए हैं। दोनों ने प्राकृतिक खेती को अपनाकर यह सिद्ध कर दिया है कि रसायन मुक्त खेती न केवल पर्यावरण के लिए लाभकारी है, बल्कि किसानों के आर्थिक सशक्तिकरण का भी मजबूत आधार बन सकती है।
राष्ट्रीय प्राकृतिक खेती मिशन के अंतर्गत वर्ष 2025 में राजनांदगांव विकासखंड में 150 हेक्टेयर क्षेत्र में क्लस्टर विकसित कर किसानों को प्राकृतिक खेती के लिए प्रशिक्षित (Chhattisgarh Organic Farming) किया गया। इसी क्रम में ग्राम मोखला की प्रगति महिला स्वसहायता समूह से जुड़े कृषकों को जीवामृत, बीजामृत, घनजीवामृत, दशपर्णी अर्क जैसे प्राकृतिक इनपुट तैयार करने और उनके वैज्ञानिक उपयोग का प्रशिक्षण दिया गया।
इस प्रशिक्षण से प्रेरित होकर 68 वर्षीय मनभौतिन बाई निषाद एवं 72 वर्षीय माखन निषाद ने (Chhattisgarh Organic Farming) को अपनाने का निर्णय लिया। शिवनाथ नदी तट पर निवास करने वाले इस दंपत्ति के पास कुल 2.34 एकड़ कृषि भूमि है, जिसमें 1.17 एकड़ स्वयं की तथा 1.17 एकड़ लीज भूमि शामिल (Chhattisgarh Organic Farming) है। पूर्व में वे रासायनिक पद्धति से धान एवं उद्यानिकी फसलों की खेती करते थे, जिससे उन्हें सालाना लगभग 50 से 60 हजार रुपये की आय होती थी।
मनभौतिन बाई निषाद बताती हैं कि रासायनिक उर्वरकों और कीटनाशकों के लगातार उपयोग से लागत बढ़ने के साथ-साथ स्वास्थ्य संबंधी समस्याएं भी सामने आ रही थीं। इसी कारण उन्होंने प्राकृतिक खेती अपनाने का निर्णय (Chhattisgarh Organic Farming) लिया। शुरुआत में उत्पादन कम होने और कीट-बीमारियों की आशंका जैसी चुनौतियां जरूर आईं, लेकिन प्रशिक्षण और अनुभव के साथ स्थिति पूरी तरह बदल गई।
प्रति एकड़ 20 से 22 हजार रुपये तक का खर्च
उन्होंने बताया कि जहां रासायनिक खेती में प्रति एकड़ 20 से 22 हजार रुपये तक का खर्च आता था, वहीं प्राकृतिक खेती में जीवामृत, घनजीवामृत, नीमास्त्र जैसे इनपुट स्थानीय संसाधनों से तैयार (Chhattisgarh Organic Farming) हो जाते हैं। देशी गाय का गोबर, गौमूत्र, गुड़, बेसन, मट्ठा और विभिन्न पत्तियां गांव में ही उपलब्ध हो जाती हैं, जिससे लागत अत्यंत कम हो गई है।
प्राकृतिक खेती के परिणामस्वरूप खेतों में केंचुओं और सूक्ष्म जीवों की संख्या बढ़ी है, जिससे मिट्टी की उर्वरता में सुधार हुआ है। फसलों की गुणवत्ता बेहतर हुई है और जहर मुक्त उत्पादों को बाजार में अच्छी कीमत (Chhattisgarh Organic Farming) मिल रही है। व्यापारी अब सीधे खेत से सब्जियां और अन्य उत्पाद खरीद रहे हैं, जिससे कृषक दंपत्ति की आय में निरंतर वृद्धि हो रही है।
आज मनभौतिन बाई निषाद जिले में (Chhattisgarh Organic Farming) की प्रेरणादायक पहचान बन चुकी हैं। उन्हें विभिन्न जिला स्तरीय कार्यक्रमों में सम्मानित किया जा चुका है और उनके अनुभव अन्य किसानों को भी प्राकृतिक खेती अपनाने के लिए प्रेरित कर रहे हैं।
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