Mahua Livelihood Model : छत्तीसगढ़ के जशपुर जिले में पारंपरिक वनोपज महुआ (Mahua Livelihood Model) अब नई आर्थिक और सामाजिक पहचान के साथ उभर रहा है। वर्षों तक केवल स्थानीय मदिरा से जोड़े जाने वाला महुआ अब सुरक्षित खाद्य उपयोग, पोषण और मूल्य संवर्धन के माध्यम से सुपर फूड के रूप में स्थापित हो रहा है। बदलती सोच और योजनाबद्ध प्रयासों के कारण महुआ आधारित आजीविका पहल ग्रामीण विकास का प्रभावी उदाहरण बनती दिखाई दे रही है।
पारंपरिक सोच से आधुनिक खाद्य पहचान तक
जशपुर से सुकमा तक महुआ आधारित आजीविका मॉडल का व्यावहारिक आदान-प्रदान इस बदलाव की सबसे बड़ी मिसाल बन रहा है। जशपुर स्थित महुआ सेंटर ऑफ एक्सीलेंस इस परिवर्तन का प्रमुख केंद्र बनकर सामने आया है, जहां महुआ को भोजन योग्य संसाधन के रूप में विकसित करने की दिशा में ठोस कार्य हो रहे हैं।
यह पहल महुआ को केवल वनोपज नहीं बल्कि पोषणयुक्त खाद्य सामग्री के रूप में स्थापित करने की सोच को आगे बढ़ा रही है। विशेषज्ञों के अनुसार पारंपरिक संसाधनों का वैज्ञानिक उपयोग ही ग्रामीण अर्थव्यवस्था को मजबूत बनाने का सबसे प्रभावी तरीका है। इसी सोच के साथ स्थानीय संसाधन आधारित विकास (Mahua Livelihood Model) को जमीन पर उतारा जा रहा है।
Mahua Livelihood Model महिला स्व-सहायता समूहों का प्रशिक्षण
इसी क्रम में सुकमा जिले के कोंटा ब्लॉक के मुंडापल्ली ग्राम से सात तथा तोंगपाल क्षेत्र से दो आदिवासी महिला स्व-सहायता समूह सदस्यों का दल जशपुर पहुंचा। यह दल एक्सपोज़र एवं फील्ड प्रशिक्षण कार्यक्रम में शामिल हुआ, जहां महुआ के फूड-ग्रेड संग्रहण, धूल-मुक्त सुखाने और सुरक्षित प्रसंस्करण की तकनीकों का प्रशिक्षण दिया गया।
प्रशिक्षण के दौरान प्रतिभागियों को बताया गया कि महुआ को जमीन से सीधे उठाने के बजाय नेट आधारित संग्रहण पद्धति अपनाने से गुणवत्ता बेहतर रहती है। स्वच्छ सुखाने की नियंत्रित प्रक्रिया और प्रारंभिक हैंडलिंग के महत्व पर भी विस्तृत प्रदर्शन किया गया। इस पहल को महिला सशक्तिकरण और आजीविका विस्तार (Mahua Livelihood Model) की दिशा में अहम कदम माना जा रहा है।
सेंटर ऑफ एक्सीलेंस में वैज्ञानिक प्रशिक्षण
महुआ सेंटर ऑफ एक्सीलेंस में आयोजित सत्रों में गुणवत्ता मानकों, खाद्य सुरक्षा और निरंतर उत्पादन प्रणाली को व्यवहारिक उदाहरणों के जरिए समझाया गया। प्रशिक्षण कार्यक्रम का संचालन समर्थ जैन द्वारा किया गया, जबकि फील्ड स्तर पर समन्वय में अनिश्वरी भगत ने सहयोग दिया।
प्रतिभागियों को यह भी समझाया गया कि यदि महुआ को वैज्ञानिक तरीके से संग्रहित और प्रोसेस किया जाए तो इसे राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय बाजारों तक पहुंचाया जा सकता है। इससे ग्रामीण समुदायों की आय में उल्लेखनीय वृद्धि संभव है। यही प्रयास ग्रामीण अर्थव्यवस्था सुदृढ़ीकरण (Mahua Livelihood Model) की दिशा में महत्वपूर्ण माना जा रहा है।
सोलर टनल ड्रायर से नई संभावनाएँ
कार्यक्रम के दौरान प्रतिभागियों ने DST समर्थित परियोजना के अंतर्गत NIFTEM द्वारा स्थापित सोलर टनल ड्रायर का अवलोकन किया। यहां फल और सब्जियों के नियंत्रित निर्जलीकरण की वैज्ञानिक प्रक्रिया का प्रदर्शन किया गया।
इस तकनीक से महुआ सहित अन्य कृषि एवं वनोपज उत्पादों को लंबे समय तक सुरक्षित रखा जा सकता है। इससे स्थानीय उत्पादों का मूल्य बढ़ाने और बाजार तक पहुंच आसान बनाने की नई संभावनाएं खुली हैं। विशेषज्ञों का मानना है कि तकनीक आधारित प्रसंस्करण से सतत आजीविका विकास (Mahua Livelihood Model) को मजबूती मिलेगी।
Mahua Livelihood Model समन्वित प्रयासों से बदल रही तस्वीर
पूरे प्रशिक्षण कार्यक्रम में जशपुर टीम के साथ PPIA फेलो श्रीकांत और NRLM से गया प्रसाद ने ऑन-ग्राउंड गतिविधियों के समन्वय में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। इस पहल ने यह स्पष्ट किया कि प्रशासन, तकनीकी संस्थानों और स्थानीय समुदायों के संयुक्त प्रयास से पारंपरिक संसाधनों को आधुनिक आर्थिक मॉडल में बदला जा सकता है।
महुआ सदियों से आदिवासी खाद्य परंपरा का हिस्सा रहा है, लेकिन अब स्वच्छता, गुणवत्ता और वैज्ञानिक प्रक्रियाओं के साथ इसे खाद्य प्रणाली में पुनः स्थापित किया जा रहा है। जशपुर में हो रहे ये प्रयास न केवल जिले की पहचान को नई दिशा दे रहे हैं, बल्कि महुआ को पारंपरिक संसाधन से आधुनिक खाद्य समाधान में बदलने की मजबूत नींव भी तैयार कर रहे हैं।







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