Sarangarh Bilaigarh News : छत्तीसगढ़ का गृह विभाग और पुलिस महकमा (Dongripali Police Station) भले ही कानून व्यवस्था को ‘हाईटेक’ और ‘सुपरफास्ट’ बनाने के बड़े-बड़े दावे करता रहे, लेकिन जमीनी हकीकत इतनी हास्यास्पद है कि इस पर तरस भी आता है और गुस्सा भी। आपातकालीन स्थिति में जनता के रक्षक बनने का दावा करने वाली ‘डायल 112’ खुद इतनी लाचार हो चुकी है कि उसे हर दो दिन में एक नए ‘इलाज’ और ‘स्ट्रेचर’ की जरूरत पड़ रही है। ओडिशा सीमा से लगे अतिसंवेदनशील डोंगरीपाली थाने में चल रहा यह तमाशा अब पुलिस विभाग की भारी किरकिरी और जनता के लिए मजाक का विषय बन चुका है।
खबर का ‘असर’ हुआ तो भेज दी बीमार बुलेट!
आपको याद होगा कि सारंगढ़ बिलाईगढ़ जिले के डोंगरीपाली थाना क्षेत्र में डायल 112 (Dongripali Police Station) की चार पहिया गाड़ी महीनों से खराब पड़ी थी और थाने के कोने में धूल फांक रही थी। इस बदहाली पर जब राजधानी टाइम्स छत्तीसगढ़ ने खबर के माध्यम से आवाज उठाई, तो विभाग में थोड़ी हलचल हुई। अफसरों ने आनन-फानन में अपनी साख बचाने के लिए एक ‘मास्टर प्लान’ निकाला। उन्होंने चार पहिया गाड़ी को सुधरवाने के बजाय आपातकालीन सेवा के नाम पर डोंगरीपाली थाने को एक बुलेट मोटरसाइकिल (नंबर CG 03 8015) थमा दी। इस कदम से ऐसा लगा मानो अब पुलिस विभाग हवा की रफ्तार से पीड़ितों तक पहुंचेगा। लेकिन विभाग की यह ‘सस्ती जुगाड़’ और नौटंकी ज्यादा देर टिक नहीं पाई।
सिर्फ 48 घंटे में फुस्स हुई बुलेट की ‘धक-धक’
कहावत है कि “मर्ज बढ़ता गया, ज्यों-ज्यों दवा की। डोंगरीपाली (Dongripali Police Station) के मामले में यह बिल्कुल सच साबित हुई। नई भेजी गई चमचमाती बुलेट थाने की दहलीज पर सिर्फ 48 घंटे यानी महज दो दिन ही ‘धक-धक’ कर पाई। दो दिन के भीतर ही इस सरकारी बुलेट ने दम तोड़ दिया। अब आलम यह है कि आपातकालीन सेवा की यह बुलेट किसी वीआईपी गैरेज में नहीं, बल्कि स्थानीय निजी ऑटो शॉप (मैकेनिक की दुकान) में अन्य आम नागरिकों की कबाड़ गाड़ियों के साथ कतार में खड़ी अपनी बारी का इंतजार कर रही है। जिस गाड़ी को दुर्घटना, अपराध या किसी आपातकालीन स्थिति में सायरन बजाते हुए सरपट दौड़ना चाहिए था, वह आज मैकेनिक की दुकान पर तमाशबीन बनी खड़ी है। इसे पुलिस की मुस्तैदी कहें या उनकी लापरवाही की पराकाष्ठा?
55 गांवों की जनता बेहाल
डोंगरीपाली (Dongripali Police Station) थाना ओडिशा सीमा से महज 8 किलोमीटर की दूरी पर स्थित है। सीमावर्ती इलाका होने के कारण यह क्षेत्र तस्करी, अवैध परिवहन और आपसी विवादों के लिहाज से बेहद संवेदनशील माना जाता है। ऐसे में आपातकालीन सेवा का इस तरह मजाक बनना अपराधियों के हौसले बुलंद करने जैसा है।
थाने (Dongripali Police Station) के अंतर्गत आने वाले लगभग 55 गांवों के गरीब और ग्रामीण लोग इस समय भगवान भरोसे हैं। कोई भी आपातकालीन कॉल आने पर पुलिस को 30 किलोमीटर दूर बरमकेला से गाड़ी मंगानी पड़ती है। जब तक मदद पहुंचती है, तब तक घटनास्थल पर सब कुछ खत्म हो चुका होता है। आपातकालीन सेवा का यह ‘गैरेज मॉडल’ सुशासन के दावों के मुंह पर एक करारा तमाचा है।
सवाल तो उठेंगे साहब! Dongripali Police Station
जब डायल 112 की चार पहिया गाड़ी महीनों से कबाड़ थी, तो उसे ठीक कराने के बजाय विभाग ने महज खानापूर्ति के लिए दोपहिया वाहन क्यों भेजा?
क्या विभाग के पास आपातकालीन सेवाओं के लिए मेंटेनेंस का बजट नहीं है, या फिर अधिकारियों की उदासीनता इस कदर हावी है कि उन्हें जनता की सुरक्षा से कोई सरोकार नहीं?
आखिर कब तक सीमावर्ती क्षेत्र के 55 गांवों के ग्रामीण इस लचर और खिल्ली उड़ाने वाली पुलिसिया व्यवस्था के भरोसे अपनी जान-माल को दांव पर लगाते रहेंगे?
डोंगरीपाली की जनता अब पूछ रही है कि साहब! डायल 112 को खुद वेंटिलेटर की जरूरत है, तो वह हमारी मदद के लिए कब और कैसे आएगी? देखना होगा कि इस ‘बुलेट ड्रामे’ के बाद अब पुलिस के आला अधिकारी कौन सा नया पैंतरा अपनाते हैं।

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