Samagra Shiksha Abhiyan Fund : छत्तीसगढ़ के स्कूली शिक्षा विभाग (Education Budget Lapse) से एक ऐसी खबर निकलकर सामने आ रही है जो प्रदेश की पूरी प्रशासनिक मशीनरी पर सवालिया निशान लगाती है। जहाँ एक ओर सरकार शिक्षा को आधुनिक बनाने के दावे करती है, वहीं दूसरी ओर विभाग के आला अधिकारी फंड का सदुपयोग करने तक में नाकाम साबित हुए हैं। ताज़ा आंकड़ों के मुताबिक, केंद्र सरकार द्वारा समग्र शिक्षा अभियान के तहत आवंटित करोड़ों रुपये के भारी-भरकम बजट के व्यपगत होने की स्थिति बन गई है क्योंकि अफसर स्वीकृत बजट का आधा हिस्सा भी खर्च नहीं कर पाए हैं।
50% खर्च भी नहीं कर पाया विभाग
केंद्रीय शिक्षा मंत्रालय के प्रोजेक्ट अप्रूवल बोर्ड (पीएबी) द्वारा छत्तीसगढ़ को चालू वित्तीय वर्ष के लिए लगभग 2400 करोड़ रुपये का बजट स्वीकृत किया गया था। उम्मीद थी कि इस राशि से प्रदेश के जर्जर स्कूलों की सूरत बदलेगी और ग्रामीण बच्चों को स्मार्ट शिक्षा मिलेगी। लेकिन, ताज्जुब की बात यह है कि वित्तीय वर्ष की समाप्ति की ओर बढ़ते हुए विभाग अब तक महज 1,195 करोड़ रुपये ही व्यय कर पाया है। यह स्वीकृत राशि का 50 प्रतिशत भी नहीं है। विडंबना देखिए कि जिलों को जो राशि भेजी गई थी, वहां के जमीनी अमले ने तो 88 प्रतिशत तक फंड का उपयोग कर लिया, लेकिन राजधानी में बैठे बड़े साहबों की फाइलों में बजट की इस बर्बादी (Education Budget Lapse) का खतरा मंडराने लगा है।
अधिकारियों के ‘म्यूजिकल चेयर’ ने बिगाड़ा काम
इस भारी विफलता की एक बड़ी वजह समग्र शिक्षा विभाग में अधिकारियों का बार-बार होने वाला तबादला भी है। एक साल के भीतर विभाग ने तीन अलग-अलग प्रबंध संचालक देखे। आईएएस संजीव कुमार झा के बाद प्रियंका शुक्ला और अब किरण कौशल के पास इसकी कमान है। अफसरों की इस अदला-बदली के बीच योजनाओं की निरंतरता टूट गई। दिसंबर में मुख्य सचिव विकास शील ने बैठक लेकर रणनीति बनाने के निर्देश दिए थे, लेकिन कागजों पर बनी वह रणनीति धरातल पर पूरी तरह विफल रही। नतीजा यह हुआ कि करोड़ों का फंड अब लैप्स (Education Budget Lapse) होने की कगार पर है।
स्मार्ट क्लास और तकनीक के सपनों पर फिरा पानी
अधिकारियों की कार्यप्रणाली का सबसे दर्दनाक असर सूचना एवं संचार प्रौद्योगिकी (आईसीटी) योजना पर पड़ा है। प्रदेश के 4000 से अधिक स्कूलों को आधुनिक कंप्यूटर लैब, फर्नीचर और स्मार्ट टीवी से लैस किया जाना था। इसके लिए लगभग 300 करोड़ रुपये का प्रावधान था। लेकिन निविदा प्रक्रिया (Tender Process) बीते दो वर्षों से फाइलों में धूल फांकती रही। अंत में जब निविदा हुई भी, तो समय सीमा समाप्त होने के करीब थी। तकनीकी बाधाओं और देरी के कारण इस सत्र में बच्चों को स्मार्ट शिक्षा मिलना अब लगभग असंभव है। यह सीधे तौर पर एक बड़ा बजट का नुकसान (Education Budget Lapse) है जिसने ग्रामीण छात्रों को डिजिटल इंडिया की दौड़ में पीछे धकेल दिया है।
बेटियों के शौचालय तक नहीं बना पाया विभाग
एक ओर केंद्र और राज्य सरकारें ‘बेटी बचाओ, बेटी पढ़ाओ’ का नारा देती हैं, वहीं छत्तीसगढ़ शिक्षा विभाग की संवेदनहीनता ने इन दावों की पोल खोल दी है। बालिकाओं के लिए स्वच्छ और सुरक्षित शौचालयों के निर्माण के लिए 40 करोड़ रुपये आवंटित किए गए थे। 2 साल बीत गए, लेकिन विभाग एक ईंट तक नहीं लगा पाया। आज भी प्रदेश के कई स्कूलों में बुनियादी सुविधाओं के अभाव में छात्राओं को स्कूल छोड़ना पड़ रहा है। बजट की यह अनदेखी (Education Budget Lapse) प्रशासनिक अक्षमता का सबसे बड़ा प्रमाण है।
भर्ती की सुस्ती ने बजट डुबोया
कौशल विकास को बढ़ावा देने के लिए 499 नए स्कूलों में व्यावसायिक प्रशिक्षकों की भर्ती की जानी थी। सत्र खत्म होने को आया लेकिन भर्ती प्रक्रिया फाइलों से बाहर नहीं निकल पाई। इसका परिणाम यह हुआ कि इन पदों के लिए सुरक्षित रखा गया बजट पूरी तरह से व्यपगत (Education Budget Lapse) हो गया। विभाग ने कार्यरत पुराने प्रशिक्षकों को तो वेतन बांट दिया, लेकिन नई भर्ती न होने से नए स्कूलों में वोकेशनल कोर्स शुरू ही नहीं हो सके।
जवाबदेही तय होना ज़रूरी Education Budget Lapse
कुल मिलाकर देखा जाए तो 2400 करोड़ की योजनाओं में से 1200 करोड़ का फंड उपयोग न हो पाना प्रदेश के बच्चों के भविष्य के साथ खिलवाड़ है। जहाँ 300 करोड़ की आईसीटी निविदा और 40 करोड़ के शौचालय निर्माण जैसे कार्य लंबित पड़े हैं, वहां जवाबदेही तय की जानी चाहिए। यदि समय रहते इन फंड्स का उपयोग नहीं किया गया, तो अगले वर्ष केंद्र सरकार छत्तीसगढ़ के बजट में कटौती कर सकती है।

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