Export Halted due to Crisis : छत्तीसगढ़ राज्य के तरबूज (Chhattisgarh Watermelon Farmers) उत्पादक किसानों के लिए यह साल खुशियों के बजाय गहरी चिंता और आर्थिक तबाही लेकर आया है। ऊँचे उत्पादन और रमजान जैसे पवित्र महीने के दौरान खाड़ी देशों के बड़े बाजार से भारी मुनाफे की उम्मीद लगाए बैठे किसानों के सपने अंतरराष्ट्रीय भू-राजनीतिक तनाव के कारण चकनाचूर हो गए हैं। अमेरिका और ईरान के बीच बढ़ते युद्ध जैसे हालातों का सीधा असर छत्तीसगढ़ के कृषि निर्यात पर पड़ा है। परिणामस्वरूप, क्राइसिस के कारण निर्यात रुक गया है (Export Halted due to Crisis), जिससे प्रदेश के किसानों को 300 करोड़ रुपये से अधिक के भारी आर्थिक नुकसान का अनुमान है।
सीजन में लगा बड़ा झटका Chhattisgarh Watermelon Farmers
खाड़ी देश, विशेषकर संयुक्त अरब अमीरात (UAE), सऊदी अरब और ओमान, छत्तीसगढ़ के रसीले तरबूजों के बड़े खरीदार रहे हैं। मुंबई और विशाखापट्टनम बंदरगाहों के रास्ते इन देशों को हर साल टन के हिसाब से तरबूज भेजा जाता था। इस साल भी रमजान के दौरान मांग चरम पर रहने की उम्मीद थी, लेकिन युद्ध की आहट ने शिपिंग रूट और व्यापारिक समझौतों को पूरी तरह बाधित कर दिया है। क्राइसिस के कारण निर्यात रुक गया है (Export Halted due to Crisis) और जो तरबूज खाड़ी देशों के डाइनिंग टेबल की शोभा बढ़ाने वाले थे, वे अब स्थानीय मंडियों में सड़ने को मजबूर हैं। निर्यात पूरी तरह बंद होने से बाजार में तरबूज की बाढ़ आ गई है, जिससे कीमतें औंधे मुंह गिर गई हैं।
कौड़ियों के भाव बिकने को मजबूर ‘लाल सोना’
आँकड़ों पर नज़र डालें तो स्थिति की भयावहता साफ झलकती है। पिछले वर्ष इसी सीजन में तरबूज की कीमतें 20,000 से 25,000 रुपये प्रति टन के बीच थीं, जिससे किसानों को बंपर कमाई हुई थी। लेकिन इस साल, क्राइसिस के कारण निर्यात रुक गया है (Export Halted due to Crisis) और स्थानीय मंडियों में आपूर्ति बढ़ने के कारण दाम गिरकर महज 7,000 से 8,000 रुपये प्रति टन तक रह गए हैं। यानी किसानों को प्रति टन लगभग 12,000 से 17,000 रुपये का सीधा नुकसान हो रहा है। लागत निकालना तो दूर, कई किसानों के लिए फसल को मंडी तक पहुँचाने का भाड़ा निकालना भी मुश्किल हो रहा है।
प्रदेश में रिकॉर्ड उत्पादन, लेकिन खरीदार नदारद
कृषि विभाग और विशेषज्ञों के अनुसार, इस वर्ष छत्तीसगढ़ में तरबूज और खरबूज की रिकॉर्ड खेती की गई है। कुल मिलाकर करीब 17,000 एकड़ में इनकी फसल ली गई है:
तरबूज की खेती (नदी क्षेत्र) : लगभग 10,000 एकड़
खरबूज की खेती : लगभग 7,000 एकड़
रायपुर, गरियाबंद, महासमुंद, बलौदाबाजार, जांजगीर-चांपा और सारंगढ़ जैसे प्रमुख उत्पादक जिलों में प्रति एकड़ औसतन 35 टन तरबूज का उत्पादन हुआ है। प्रदेश का कुल उत्पादन लगभग 5.88 लाख टन तक पहुँच गया है। विडंबना यह है कि इतना बेहतर उत्पादन होने के बावजूद, क्राइसिस के कारण निर्यात रुक गया है (Export Halted due to Crisis) और किसान अपनी ही फसल के बोझ तले दबे जा रहे हैं। स्थानीय बाजार इतनी बड़ी खपत को संभालने में सक्षम नहीं है।
व्यापारियों का पैदल आना बंद, अब किसान लगा रहे चक्कर
बलौदाबाजार जिले के डोंगरीडीह महानदी पुल कछार क्षेत्र के एक हताश किसान ने अपनी आपबीती सुनाते हुए कहा कि फरवरी के शुरुआती दिनों में स्थिति सामान्य थी। तब 17,000 रुपये प्रति टन के भाव से 100 से अधिक ट्रक माल बाहर गया था। लेकिन होली के बाद से अंतरराष्ट्रीय हालात बिगड़ते ही व्यापारियों ने मुँह मोड़ लिया। उन्होंने बताया, “पहले व्यापारी हमारे कछार (खेत) तक पैदल चलकर बोली लगाने पहुँचते थे, लेकिन अब, क्राइसिस के कारण निर्यात रुक गया है (Export Halted due to Crisis) और स्थिति यह है कि हमें खरीदारों की तलाश में व्यापारियों के पास बार-बार चक्कर लगाने पड़ रहे हैं। फिर भी कोई सही दाम देने को तैयार नहीं है।”
युद्ध ही मुख्य कारण Export Halted due to Crisis
थोक सब्जी मंडी डूमरतराई रायपुर के अध्यक्ष टी. श्रीनिवास रेड्डी ने कहा कि छत्तीसगढ़ के फल, विशेष रूप से तरबूज, पहले इराक और संयुक्त अरब अमीरात तक निर्यात होते थे। लेकिन वर्तमान अमेरिका-ईरान तनाव और युद्ध के हालातों के कारण, क्राइसिस के कारण निर्यात रुक गया है (Export Halted due to Crisis), और यह पूरी तरह बंद हो गया है।
रेड्डी ने आगे कहा, “इसका सबसे ज्यादा नकारात्मक असर तरबूज की फसल पर पड़ा है। प्रदेश में उत्पादन बहुत अच्छा हुआ है, लेकिन माल बाहर नहीं जा पा रहा। इससे स्थानीय बाजार में खपत बढ़ी और दाम ऐतिहासिक रूप से गिर गए। जो तरबूज पिछले साल 25,000 रुपये प्रति टन तक बिका था, वह इस बार 8,000 रुपये पर आ गया है। मुंबई के लिए रोज होने वाला 12-15 ट्रक का निर्यात भी पूरी तरह प्रभावित हुआ है।”
कुल मिलाकर, अंतरराष्ट्रीय संकट ने छत्तीसगढ़ के मेहनतकश किसानों की कमर तोड़ दी है। उनकी लहलहाती फसल, जो कभी समृद्धि का प्रतीक थी, अब उनके लिए मुसीबत का सबब बन गई है। यदि सरकार ने जल्द ही कोई वैकल्पिक बाजार खोजने या किसानों को मुआवजा देने के लिए ठोस कदम नहीं उठाए, तो प्रदेश का कृषि क्षेत्र एक बड़े संकट में फँस सकता है। किसानों की उम्मीदें अब केवल सरकारी हस्तक्षेप पर टिकी हैं क्योंकि क्राइसिस के कारण निर्यात रुक गया है (Export Halted due to Crisis) और वे बेसहारा महसूस कर रहे हैं।

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