Stone Crusher Pollution : सफेद डस्ट की मार से घुट रहा दम, घर-आंगन बने धूल के ढेर

कटंगपाली और आसपास के गांवों में क्रशर उद्योगों से फैल रहा सफेद डस्ट (Stone Crusher Pollution) अब गंभीर संकट बन चुका है। पानी छिड़काव की अनदेखी, अवैध खनन और प्रशासनिक लापरवाही ने ग्रामीणों का जीना मुश्किल कर दिया है, जहां हर सांस अब बीमारी का खतरा बनती जा रही है।

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Stone Crusher Pollution
Highlights
  • सफेद डस्ट से गांव में सांस लेना हुआ मुश्किल
  • पानी छिड़काव बंद, क्रशर संचालकों की खुली मनमानी
  • अवैध खदानों और प्रदूषण पर प्रशासन पूरी तरह मौन

Baramekela News : छत्तीसगढ़ के सारंगढ़-बिलाईगढ़ जिले के तहसील मुख्यालय सरिया (Stone Crusher Pollution)  से महज 10 किलोमीटर दूर स्थित ग्राम पंचायत कटंगपाली-‘अ’ इन दिनों सफेद जहर की चपेट में है। यहां फैल रहा धूल और सफेद डस्ट अब केवल असुविधा नहीं बल्कि एक खतरनाक आपदा का रूप ले चुका है। क्रशर उद्योगों की बेलगाम गतिविधियों और पानी छिड़काव की पूरी तरह अनदेखी ने पूरे इलाके को धूल के बादल में बदल दिया है।

कटंगपाली क्षेत्र में चारों दिशाओं में संचालित हो रहे क्रशर उद्योग लगातार वातावरण में जहर घोल रहे हैं। क्रशर मशीनों से उड़ने वाली सूक्ष्म धूल अब सफेद डस्ट (Stone Crusher Pollution) बनकर ग्रामीणों के घरों, आंगनों और यहां तक कि सांसों में समा रही है। हालात यह हैं कि घरों की छतों पर मोटी धूल की परत जम चुकी है, कपड़े और घरेलू सामान सफेद राख जैसे कणों से ढक चुके हैं।

ग्रामीणों का आरोप है कि पिछले वर्ष पंचायत के निर्देश पर नियमित पानी छिड़काव कराया जाता था, लेकिन इस बार क्रशर संचालकों ने पूरी तरह से इस नियम को ताक पर रख दिया है। न तो क्रशर परिसर के भीतर पानी डाला जा रहा है और न ही बाहर की सड़कों पर। परिणामस्वरूप पूरे इलाके में सफेद डस्ट (Stone Crusher Pollution) का धुंध छाया रहता है, जिससे सुबह-शाम अंधेरा जैसा माहौल बन जाता है।

सबसे गंभीर बात यह है कि जिन स्थानों पर क्रशर उद्योग स्थापित किए गए हैं, वे आबादी से सटे हुए हैं। नियमों के मुताबिक क्रशर को कम से कम एक किलोमीटर दूर होना चाहिए, लेकिन कटंगपाली में हर्ष मिनरल्स और आराधना मिनरल्स जैसे उद्योग गांव के मोहल्लों के बिल्कुल करीब संचालित हो रहे हैं। इससे सफेद डस्ट (Stone Crusher Pollution) का असर सीधे ग्रामीणों के स्वास्थ्य पर पड़ रहा है।

ग्रामीणों का कहना है कि इस धूल के कारण सांस लेने में तकलीफ, आंखों में जलन और लगातार खांसी जैसी समस्याएं तेजी से बढ़ रही हैं। कई लोगों को फेफड़ों से जुड़ी गंभीर बीमारियों का खतरा भी सताने लगा है। बावजूद इसके न तो स्वास्थ्य विभाग कोई जांच कर रहा है और न ही प्रशासन इस गंभीर स्थिति को लेकर सक्रिय नजर आ रहा है।

पर्यावरण संरक्षण के नाम पर केवल खानापूर्ति

कटंगपाली, साल्हेओना, छेलफोरा और नौघटा क्षेत्र में संचालित क्रशर उद्योगों द्वारा पर्यावरण संरक्षण के नाम पर केवल खानापूर्ति की जा रही है। कहीं-कहीं नाम मात्र के पौधे लगाए गए हैं, लेकिन उनका कोई प्रभाव नहीं दिख रहा। सफेद डस्ट (Stone Crusher Pollution) के लगातार फैलाव ने पूरे इलाके की हरियाली को भी खत्म कर दिया है।

स्थिति इतनी भयावह हो चुकी है कि क्षेत्र में सिलीकोसिस जैसी घातक बीमारी का खतरा मंडराने लगा है। क्रशर में काम करने वाले मजदूरों को न तो सुरक्षा उपकरण दिए जा रहे हैं और न ही उन्हें स्वास्थ्य सुविधाएं उपलब्ध कराई जा रही हैं। यहां तक कि परंपरागत रूप से मिलने वाले गुड़ और चना जैसी बुनियादी चीजें भी अब बंद हो चुकी हैं।

अवैध खनन का बढ़ता साम्राज्य Stone Crusher Pollution

इस पूरे मामले में सबसे चौंकाने वाला पहलू अवैध खनन का है। प्रशासन द्वारा जिन क्षेत्रों को डोलोमाइट खनन के लिए लीज पर दिया गया है, उनके आसपास अवैध खदानों का जाल फैल चुका है। इन खदानों में लगातार खनन से गहरी खाइयां बन चुकी हैं, जो कभी भी बड़े हादसे का कारण बन सकती हैं।

इन खतरनाक गड्ढों के आसपास न तो कोई सुरक्षा व्यवस्था है और न ही चेतावनी बोर्ड लगाए गए हैं। साफ तौर पर कहा जा सकता है कि सफेद डस्ट (Stone Crusher Pollution) के साथ-साथ अवैध खनन का यह खेल ग्रामीणों की जिंदगी के साथ खुला खिलवाड़ है।

ग्रामीण नरेश मिरी का कहना है कि “इस साल न मुख्य सड़क पर पानी डाला जा रहा है और न ही गांव की गलियों में। सुबह-शाम धूल का गुबार इतना घना हो जाता है कि कुछ दिखाई नहीं देता। अब यहां रहना मुश्किल हो गया है।” यह बयान केवल एक व्यक्ति की पीड़ा नहीं बल्कि पूरे कटंगपाली क्षेत्र की सच्चाई है।

 

 

 

 

 

 

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