Sukma News : “स्किल डेवलपमेंट” और “पर्यावरण संरक्षण” के विजन को धरातल पर उतारते हुए सुकमा के कोण्टा विकासखंड मुख्यालय में स्थित शासकीय बालक हाईस्कूल पोटाकेबिन ने (Waste Water Management) के क्षेत्र में एक प्रेरणादायक उदाहरण प्रस्तुत किया है। जल संकट और सीमित संसाधनों के बावजूद स्कूल प्रबंधन द्वारा अपनाई गई इस पहल ने न केवल परिसर की तस्वीर बदल दी है, बल्कि छात्रों के लिए सीखने की एक जीवंत प्रयोगशाला भी तैयार कर दी है।
पोटाकेबिन स्कूल परिसर के आसपास लंबे समय से पानी की कमी एक गंभीर समस्या रही है। ऐसे में विद्यालय के प्राचार्य और शिक्षकों ने पारंपरिक सोच से हटकर बेकार बह रहे पानी के पुनः उपयोग की योजना बनाई। इस सोच की नींव (Waste Water Management) आधारित उस नवाचार पर टिकी है, जिसमें व्यर्थ समझे जाने वाले संसाधनों को उपयोगी बनाया गया।
बेकार बहते पानी से हरियाली का रास्ता
स्कूल परिसर के समीप स्थित एकलव्य आवासीय विद्यालय से प्रतिदिन काफी मात्रा में पानी व्यर्थ बह जाता था। इस पानी को सहेजने और सही दिशा में उपयोग करने के लिए प्राचार्य ने शिक्षकों के साथ मिलकर एक सरल लेकिन प्रभावी कार्ययोजना बनाई। इस योजना का मूल उद्देश्य (Waste Water Management) के जरिए जल संरक्षण के साथ-साथ हरियाली को बढ़ावा देना था।
पुराने और अनुपयोगी पाइपों, कबाड़ सामग्री और मात्र आधे हॉर्सपावर के टुल्लू पंप की मदद से एक ड्रिप इरिगेशन यानी टपक सिंचाई प्रणाली तैयार की गई। यह सिस्टम सीधे पौधों की जड़ों तक पानी पहुंचाता है, जिससे जल की बर्बादी रुकती है और पौधों को आवश्यक मात्रा में नमी मिलती है।
100 से अधिक पौधों को मिला जीवनदान
इस नवाचार के माध्यम से स्कूल परिसर में लगाए गए 100 से अधिक फलदार, छायादार और सजावटी पौधे आज लहलहा रहे हैं। जहां पहले सूखी जमीन नजर आती थी, वहीं अब हरियाली छात्रों और शिक्षकों का मन मोह रही है। (Waste Water Management) आधारित यह मॉडल यह साबित करता है कि इच्छाशक्ति और रचनात्मक सोच हो तो सीमित संसाधनों में भी बड़े बदलाव संभव हैं।
छात्रों के लिए “लाइव लैब” बना विद्यालय
यह पहल केवल पौधों की सिंचाई तक सीमित नहीं रही। स्कूल अब छात्रों के लिए एक “लाइव लैब” के रूप में विकसित हो चुका है। छात्र प्रत्यक्ष रूप से सीख रहे हैं कि किस तरह नालों और व्यर्थ बहने वाले पानी का उपयोग कर किचन गार्डन और सब्जी उत्पादन किया जा सकता है।
यह प्रक्रिया बच्चों को (Waste Water Management) की व्यवहारिक समझ देने के साथ-साथ आधुनिक, टिकाऊ और व्यावसायिक कृषि की ओर भी प्रेरित कर रही है। कई छात्र अब अपने घरों में भी इस तकनीक को अपनाने लगे हैं। इससे न केवल घरेलू खर्च में कमी आ रही है, बल्कि जल संरक्षण और पर्यावरण के प्रति जागरूकता भी बढ़ रही है।
कौशल विकास और पर्यावरण संरक्षण का संगम
विद्यालय का यह प्रयास जिला प्रशासन की उस सोच को मजबूती देता है, जिसमें शिक्षा को सिर्फ पुस्तकों तक सीमित न रखकर जीवन से जोड़ने पर जोर दिया जा रहा है। (Waste Water Management) आधारित यह प्रयोग छात्रों में नवाचार, समस्या समाधान और संसाधन प्रबंधन जैसे महत्वपूर्ण कौशल विकसित कर रहा है।
स्कूल परिसर धीरे-धीरे एक “ईको-फ्रेंडली जोन” में तब्दील हो चुका है। स्वच्छ वातावरण, हरियाली और जल संरक्षण का यह मॉडल आसपास के अन्य शैक्षणिक संस्थानों के लिए भी प्रेरणास्रोत बन रहा है।
प्रशासन की सराहना और भविष्य की दिशा
जिला प्रशासन द्वारा इस पहल की सराहना की जा रही है। अधिकारियों का मानना है कि इस तरह के नवाचार न केवल सरकारी योजनाओं को जमीनी स्तर पर सफल बनाते हैं, बल्कि स्थानीय स्तर पर उपलब्ध संसाधनों के सर्वोत्तम उपयोग का मार्ग भी प्रशस्त करते हैं। आने वाले समय में (Waste Water Management) मॉडल को अन्य स्कूलों और शासकीय संस्थानों में भी लागू करने की संभावनाओं पर विचार किया जा रहा है।
Waste Water Management सीख और संदेश
पोटाकेबिन स्कूल का यह प्रयास यह संदेश देता है कि जल संकट का समाधान बड़े बजट या जटिल तकनीक से ही संभव नहीं है। सही सोच, सामूहिक प्रयास और नवाचार से स्थानीय स्तर पर भी बड़े बदलाव लाए जा सकते हैं। यह मॉडल शिक्षा, पर्यावरण और आत्मनिर्भरता को जोड़ते हुए भविष्य की दिशा तय करता है।










