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Kadomali Revenue Village : आजादी के 79 साल बाद भी सरकारी नक्शे से गायब है छत्तीसगढ़ का यह गांव

Chhattisgarh Land Revenue Code : भारतीय लोकतंत्र के महायज्ञ में हर पांच साल (Kadomali Revenue Village) बाद यहां के ग्रामीण भी आहूति देते हैं। वोट डालकर सरकारें चुनते हैं और संविधान प्रदत्त नागरिक होने का अपना कर्तव्य भी निभाते हैं। लेकिन विडंबना देखिए कि जिस धरती पर उनकी सात पीढ़ियां खप गईं, वह गांव सरकारी दस्तावेजों में आज भी बेनाम है। हम बात कर रहे हैं बस्तर जिले की तहसील करपावंड के अंतर्गत आने वाले गांव कादोमाली की, जो आजादी के आठ दशकों बाद भी स्वतंत्र राजस्व ग्राम का दर्जा पाने के लिए तरस रहा है।

 

नक्शे में नहीं है नाम, योजनाओं से है वनवास

देश की आजादी को 79 वर्ष बीत चुके हैं, लेकिन ग्राम पंचायत पाथरी (Kadomali Revenue Village) का यह आश्रित गांव आज भी पराधीनता के भाव में जीने को विवश है। सरकारी रिकॉर्ड में इस गांव का स्वतंत्र अस्तित्व न होने के कारण यहां विकास की किरणें नहीं पहुंच पा रही हैं। नियमानुसार, राजस्व ग्राम न होने की वजह से इस गांव का अपना कोई पटवारी, सचिव या सरपंच नहीं है। हर छोटे-बड़े काम के लिए, चाहे वह राशन कार्ड बनवाना हो, पेंशन की गुहार लगानी हो या जाति प्रमाण पत्र हासिल करना हो, ग्रामीणों को 3 किलोमीटर का कठिन सफर तय कर पाथरी पंचायत मुख्यालय जाना पड़ता है।

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पीढ़ियां गुजर गईं, पर नहीं मिला स्वतंत्र वजूद

ग्रामीणों के अनुसार, कादोमाली (Kadomali Revenue Village) 1950 से कई वर्षों पहले से आबाद है। यहां के बुजुर्ग बताते हैं कि उनके पूर्वजों ने जंगल साफ कर इस गांव को बसाया था। आज यहां की तीसरी और चौथी पीढ़ी जवान हो रही है, मगर सरकारी फाइलों में आज भी यह गांव केवल ‘पाथरी’ का एक हिस्सा मात्र है। राजस्व ग्राम का दर्जा न मिलने से ग्रामीणों को सबसे अधिक नुकसान सरकारी योजनाओं के लाभ में हो रहा है।

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कादोमाली के ग्रामीण जीविकोपार्जन के लिए पूरी तरह से मजदूरी और वनोपज पर निर्भर हैं। वन अधिकार पट्टे (Forest Rights Act) के तहत जमीन का मालिकाना हक पाने के उनके दावे भी बेअसर साबित हो रहे हैं क्योंकि राजस्व नक्शे में गांव का भौतिक स्थान ही स्पष्ट नहीं है।

मनरेगा और पेयजल की स्थिति दयनीय Kadomali Revenue Village

गांव (Kadomali Revenue Village) की बदहाली का आलम यह है कि केंद्र और राज्य सरकार की महत्वाकांक्षी योजनाएं यहां दम तोड़ रही हैं:

पेयजल संकट : गांव में नल-जल योजना के तहत पाइपलाइन तो बिछाई गई है, लेकिन नलों में पानी का नामोनिशान नहीं है। ग्रामीण आज भी तालाब और नालों के दूषित पानी से अपनी प्यास बुझाने को मजबूर हैं।

मनरेगा में उपेक्षा : मनरेगा के तहत जब पाथरी पंचायत में काम शुरू होता है, तो प्राथमिकता मुख्यालय के लोगों को दी जाती है। कादोमाली के आदिवासियों को काम के लिए दर-दर भटकना पड़ता है। उनके लिए पृथक से कोई कार्ययोजना तैयार नहीं की जा सकती क्योंकि गांव राजस्व रिकॉर्ड में दर्ज ही नहीं है।

नियमों की कसौटी पर खरा, फिर भी अनदेखा

छत्तीसगढ़ भू-राजस्व संहिता 1959 की धारा 73 स्पष्ट रूप से कहती है कि यदि किसी मजरे-टोले की आबादी 200 से अधिक है और वह निर्धारित मापदंडों को पूरा करता है, तो उसे स्वतंत्र राजस्व ग्राम घोषित किया जा सकता है। कादोमाली (Kadomali Revenue Village) की वर्तमान जनसंख्या लगभग 600 है, जो राजस्व ग्राम बनने की सभी शर्तों को पूरा करती है। इसके बावजूद, जिला प्रशासन और राजस्व विभाग की ओर से अब तक इस दिशा में कोई ठोस कदम नहीं उठाया गया है।

ग्रामीण फूलसिंग नेताम ने बताया कि उन्होंने मुख्यमंत्री जन शिकायत पोर्टल से लेकर तहसील कार्यालय और कलेक्टर जगदलपुर तक कई बार लिखित आवेदन दिए और ज्ञापन सौंपे। लेकिन आज तक कोई भी जिम्मेदार अधिकारी गांव की जमीनी हकीकत देखने नहीं पहुंचा।

क्या हम सरकारी नजर में मर चुके हैं Kadomali Revenue Village

संवाददाता से चर्चा के दौरान ग्रामीणों का आक्रोश और दुख फूट पड़ा। ग्रामीणों ने सवाल उठाते हुए कहा “हमारा गांव नक्शे में नहीं है, तो क्या सरकार की नजर में हमारा कोई वजूद नहीं है? क्या प्रशासन ने हमें मृत मान लिया है? ग्रामीणों (Kadomali Revenue Village) ने बताया कि आपातकालीन परिस्थितियों में उनकी सुध लेने वाला कोई नहीं होता। यदि गांव में आग लग जाए, बाढ़ आए या कोई गंभीर बीमारी फैल जाए, तो जिला मुख्यालय से टीम पहुंचने में कई दिन लग जाते हैं क्योंकि गांव तक पहुंचने का रास्ता सुगम नहीं है और दस्तावेजों में इसकी पहचान धुंधली है।

 

 

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